12/17/2020

बनारस के ऐतिहसिक लाल चर्च प्रभु ईसा मसीह कि शहादत का प्रतीक हैं,याद ताज़ा करता ये चर्च


मोहम्मद रिज़वान
वाराणसी/कैंटोमेंट स्थित ऐतिहसिक लाल चर्च प्रभु ईसा मसीह कि शहादत का प्रतीक हैं, इस चर्च कि संगे बुनियाद छावनी इलाके में ब्रिटिश पादरी एलवर्ट फैंटीमैन ने 1879 में रखी थी। उस समय आज का बनारस क्लब से लगातयत पूरा इलाका सेना की छावनी में तबदील था। ब्रिटिश सेना में ज्यादातर प्रोटेस्टेन्ट मसीही थे। सेना के लिए ही चर्च बनाकर आराधना के लिए ही ब्रिटेन से पादरी एलवर्ट को उस दौर कि हुकुमत ने बनारस बुलाया था। एलवर्ट के ही निर्देशन में लाल गिरजा बन कर तैयार हुआ। चर्च से जुड़े लोगों की माने तो 1887 में चर्च के पहले भारतीय पादरी ई. लाल बनाए गए। उन्होंने प्रभु यीशु की आराधना 1903 तक कराई। 1903 में आई. सआदतउल्ला पादरी बने। उनकी पूरी जिंदगी इसी चर्च में आराधना कराते हुए बीती। मिस्टर रसल, डीडी पिताम्बरी भी यहां पादरी थे। 1995 में सैम जोशुआ सिंह को गिरजा का 60 वां पादरी बनाया गया, जो वर्ष 2016 तक यहां पादरी थे। सैम जोशुआ सिंह का तबादला सेंट पाल र्चच सिगरा जब हो गया तब से वर्तमान में यहां पादरी संजय दान पुरोहित है, लाल गिरजा के सचिव विजय दयाल बताते हैं कि लाल गिरजा का रंग आज भी लाल है। लाल रंग ईसा मसीह की शहादत का प्रतीक माना जाता है, तो सफेद रंग अमन और शांति का। इसी रंग से गिरजाघर को खूबसूरती प्रदान की गई है। वो कहते हैं कि यह महज़ आराधना घर ही नहीं बल्कि गंगा जमुनी तहज़ीब का केंद्र भी है। यहाँ के लोग हमेशा दूसरे मज़हब के लोगों के साथ भी आपसी सौहार्द का परिचय देते है। यहा बनारस आने वाले तमाम सैलानी भी समय-समय पर आराधना के दौरान नज़र आते हैं

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