मदीना की दर्द भरी जुदाई के बाद इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का काफ़िला मक्का मुकर्रमा पहुँचा। यह वही शहर था जहाँ काबा मौजूद है, जहाँ हर साल लाखों मुसलमान इबादत के लिए आते हैं और जहाँ की फ़िज़ाओं में तौहीद की सदाएँ गूँजती हैं।
मदीना से निकलने के बाद मक्का पहुँचकर कुछ वक़्त के लिए ऐसा लगा जैसे हालात में कुछ सुकून आ गया हो। लोग इमाम हुसैन (रज़ि.) से मिलने आने लगे। दूर-दूर से आने वाले मुसाफ़िर उनसे मुलाक़ात करते, दुआएँ लेते और उनकी बातों को सुनते।
लेकिन दूसरी तरफ़ इराक़ के शहर कूफ़ा में एक अलग ही माहौल बन रहा था।
कूफ़ा के बहुत से लोग यज़ीद की हुकूमत से नाखुश थे। जब उन्हें पता चला कि इमाम हुसैन (रज़ि.) ने बैअत नहीं की है और वह मक्का में मौजूद हैं, तो उनके दिलों में उम्मीद की एक नई किरण जागी।
धीरे-धीरे कूफ़ा से ख़त आने शुरू हुए।
एक ख़त आया...
फिर दूसरा...
फिर तीसरा...
फिर दर्जनों...
फिर सैकड़ों...
और फिर हजारों ख़त।
हर ख़त में लगभग एक ही बात लिखी होती थी—
"ऐ रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे! हमारे पास आइए। हम आपका साथ देंगे। हम आपके हाथ पर बैअत करेंगे। हमारे पास कोई ऐसा इमाम नहीं जो हमें दीन के मुताबिक़ रास्ता दिखाए। आइए, हम आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
कहा जाता है कि इतने ज़्यादा ख़त आए कि उनके बंडल बन गए। हर तरफ़ से एक ही पुकार सुनाई दे रही थी—
"हुसैन आइए, हम आपके साथ हैं।"
सोचिए...
अगर कोई इंसान हजारों लोगों की तरफ़ से बार-बार बुलाया जाए, बार-बार वफ़ादारी का यक़ीन दिलाया जाए, हर तरफ़ से मदद के वादे किए जाएँ, तो उसे क्या महसूस होगा?
यक़ीनन उसे यही लगेगा कि लोग सच्चे हैं और मदद के लिए तैयार हैं।
लेकिन इंसान की ज़बान और उसके दिल में फ़र्क़ भी हो सकता है।
यही वह जगह है जहाँ से कर्बला का एक बहुत बड़ा सबक़ शुरू होता है।
बहुत से लोग हक़ की बातें करते हैं, लेकिन जब हक़ की कीमत चुकाने का वक़्त आता है तो पीछे हट जाते हैं।
बहुत से लोग नारे लगाते हैं, लेकिन जब कुर्बानी माँगी जाती है तो ग़ायब हो जाते हैं।
बहुत से लोग कहते हैं कि हम आपके साथ हैं, मगर मुसीबत आने पर सबसे पहले वही छोड़कर चले जाते हैं।
कूफ़ा वालों के ख़तों में मोहब्बत थी, वादे थे, दावे थे और मदद की बातें थीं। लेकिन अभी वक़्त ने साबित नहीं किया था कि इनमें से कितनी बातें सच्ची हैं।
इमाम हुसैन (रज़ि.) जल्दबाज़ी करने वाले नहीं थे। उन्होंने सिर्फ़ ख़त देखकर सफ़र का फैसला नहीं किया। वह अच्छी तरह जानते थे कि किसी भी बड़ी बात की तहक़ीक़ करना ज़रूरी है।
यही वजह थी कि उन्होंने अपने चचेरे भाई और भरोसेमंद साथी हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) को कूफ़ा भेजने का फैसला किया।
मक़सद यह था कि वह वहाँ जाकर हालात देखें, लोगों की नीयत को परखें और सही जानकारी लेकर वापस आएँ।
यह फैसला बताता है कि इस्लाम हमें जज़्बात में आकर कदम उठाने की नहीं, बल्कि सोच-समझकर फैसला करने की तालीम देता है।
आज हम अक्सर सोशल मीडिया की एक पोस्ट देखकर राय बना लेते हैं।
एक अफ़वाह सुनकर यक़ीन कर लेते हैं।
एक वीडियो देखकर फैसला सुना देते हैं।
लेकिन इमाम हुसैन (रज़ि.) ने हमें सिखाया कि किसी भी अहम मामले में तहक़ीक़, समझदारी और दूरअंदेशी ज़रूरी है।
मक्का में बैठे हुए हुसैन (रज़ि.) के पास लगातार ख़त आ रहे थे।
हर ख़त उम्मीद दे रहा था।
हर पैग़ाम एक नई बात कह रहा था।
हर आवाज़ उन्हें कूफ़ा बुला रही थी।
लेकिन शायद तक़दीर कुछ और लिख चुकी थी।
जिन लोगों की कलमें आज वफ़ादारी लिख रही थीं, उनमें से बहुत से लोग आने वाले दिनों में अपने वादे भूल जाने वाले थे।
जिन हाथों ने आज मदद का दावा किया था, उन्हीं में से बहुत से हाथ कल पीछे हट जाने वाले थे।
लेकिन अभी यह राज़ पर्दे में था।
अभी तो कूफ़ा से सिर्फ़ उम्मीद की खबरें आ रही थीं।
अभी तो लोगों की मोहब्बत और वफ़ादारी के दावे सुनाई दे रहे थे।
अभी तो कर्बला का दर्दनाक मंज़र बहुत दूर दिखाई देता था।
मगर अल्लाह की तक़दीर अपना रास्ता बना रही थी।
आज जब हम इस हिस्से को पढ़ते हैं तो अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए—
क्या हम सिर्फ़ ज़बान से दीन का साथ देते हैं या अमल से भी?
क्या हम सिर्फ़ नारे लगाते हैं या कुर्बानी भी देते हैं?
क्या हम मुश्किल वक़्त में भी अपने वादों पर कायम रहते हैं?
क्योंकि कर्बला का एक बड़ा सबक़ यह है कि अल्लाह के यहाँ दावे नहीं, बल्कि अमल देखे जाते हैं।
*इबरत*
कूफ़ा वालों के ख़त हमें सिखाते हैं कि सिर्फ़ वादे करना आसान है, लेकिन वादे निभाना मुश्किल है। सच्चा मोमिन वही है जो अच्छे दिनों में भी और मुश्किल दिनों में भी अपने अहद पर कायम रहे।
हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ि.) का कूफ़ा पहुँचना, लोगों का जोश, बैअत का सिलसिला और फिर अचानक बदलते हुए हालात।
No comments:
Post a Comment