7/02/2026

होर्मुज संकट का मुकाबलाभारत ने सबसे बड़े ऊर्जा संकट का कैसे सामना किया- हरदीप सिंह पुरी

होर्मुज संकट का मुकाबला
भारत ने सबसे बड़े ऊर्जा संकट का कैसे सामना किया

- हरदीप सिंह पुरी    
      
जब फरवरी के अंत में होर्मुज की खाड़ी बंद हुई, तो भारत सरकार ने एक प्राथमिकता का चयन किया - हमारे देश के नागरिकों, विशेष रूप से सबसे कमजोर समुदायों, को अभूतपूर्व आपूर्ति और मूल्य व्यवधानों से सुरक्षित रखना। इस प्राथमिकता के आस-पास ही अन्य प्रयास किये जाने थे। यह भावना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थी और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा व्यवधान के लगभग चार महीनों तक बनी रही। 
तथ्यों के पता चलने से पहले ही भारत को लेकर निर्णय किये जा रहे थे: तर्क यह था कि एक ऐसा देश, जो अपने  कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, होर्मुज के बंद होने से संभल नहीं पायेगा, जिससे होकर दुनिया का 20-30% से अधिक हाइड्रोकार्बन गुजरता है। पेट्रोल पंप में कुछ ही दिनों में तेल ख़त्म हो जाएगा, कीमतें आसमान छुएंगी (जैसे कि कई अन्य देशों में हुआ) और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आज स्टॉक भरे हुए हैं, पंप खुले हैं, और भारतीय उपभोक्ता ने इस संकट के दौरान ऊर्जा के लिए दुनिया के किसी भी अन्य उपभोक्ता की तुलना में कम भुगतान किया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे कैसे किया गया और इससे गलत आख्यानों को जवाब भी मिल जाएगा।
28 फरवरी को ईरान पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर सबसे महत्वपूर्ण मार्ग-खंड बंद हो गया और एलपीजी आपूर्ति ने भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश की, क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका और मध्य पूर्व ही प्रमुख एलपीजी निर्यातक हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी पहले मध्य पूर्व से आती थी और यह आपूर्ति तुरंत लगभग शून्य हो गई। फिर आपूर्ति और मांग, दोनों को लेकर एक युद्धकक्ष ऑपरेशन शुरू हुआ, हर कार्गो, हर रिफाइनरी, हर बॉटलिंग प्लांट की निगरानी की गयी, ताकि पूरे देश के सभी रसोईघरों में खाना पकाने के लिए आग जलती रहे।
आपूर्ति के संबंध में, 8 मार्च को एलपीजी नियंत्रण आदेश पारित किया गया, जिसके तहत सभी रिफाइनरियों को अपना एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए सभी सी3-सी4 कार्बन स्ट्रीम को बदलने का निर्देश दिया गया। जो रिफाइनरी कभी कुकिंग गैस नहीं बनाती थीं, बदलाव किया गया और उत्पादन 35  टीएमटी प्रति दिन से बढ़कर 54 टीएमटी प्रति दिन हो गया। युद्ध की सर्वाधिक विभीषिका के दौरान, जब होर्मुज से कोई भी जहाज बाहर नहीं निकल रहा था, तब 12 से अधिक भारतीय एलपीजी जहाजें चुपचाप होर्मुज से बिना कोई टोल दिए निकाल दी गईं - किसी भी देश के लिए यह सबसे बड़ी संख्या थी। कार्गो सुरक्षित किए गए तथा यानबू और फुजैरा बंदरगाहों से लाल सागर रास्ते के जरिए कार्गो जहाज-से-जहाज स्थानांतरित किये गये। अमेरिका से कार्गो को सुरक्षित करने की स्थिति में भी खाली जहाज भेजे गए, नए माल लेने के लिए जहाज हॉर्मुज के अंदर भेजे गए तथा अल्जीरिया, जापान और कनाडा जैसे कई देशों के साथ नई आपूर्ति व्यवस्था शुरू की गयी। मैंने हर उस देश के ऊर्जा मंत्री से कई बार बात की, जो एलपीजी निर्यात कर सकता था। मैं यह बात कहना चाहता हूँ कि खाड़ी क्षेत्र के अंदर या बाहर का हर उत्पादक, जिसके साथ हमने व्यापार किया, हमारे साथ खड़ा रहा। 
हालांकि, आपूर्ति प्रयास का केवल आधा हिस्सा था, क्योंकि मांग को भी प्राथमिकता देना जरूरी था। घरों में जाने वाला रसोई गैस पूरा सुरक्षित रखा गया और इस कीमती आपूर्ति को काले बाज़ारियों से बचाने के लिए डिजिटल सत्यापन कोड अनिवार्य किया गया। हर नागरिक को उनके ज़रूरत के समय सिलेंडर मिलें, लेकिन कोई भी सिलेंडर जमा न कर सके, इसके लिए 25 दिन और 45 दिन की सीमा लगाई गई। चूँकि, वाणिज्यिक सिलेंडरों को नियंत्रित नहीं किया जाता और कोई भी खरीदार उपलब्ध पूरी आपूर्ति एक साथ खरीद सकता था, इसलिए इन्हें उद्योग संघों और राज्य नागरिक आपूर्ति विभागों के माध्यम से भेजा गया, ताकि हर किसी को पर्याप्त मिले और कोई भी जमा न कर सके। उद्योग को पाइप प्राकृतिक गैस अपनाने के लिए कहा गया, बड़े रसोईघरों और प्रतिष्ठानों को अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जहाँ संभव था और घरेलू पाइप गैस और सीएनजी को बिना कटौती वाले वर्ग में रखा गया। सरकार के सभी विभागों ने मिलकर नगर निगम की शीघ्र मंज़ूरी के ज़रिए पाइप गैस कनेक्शनों की ओर बदलाव को संभव बनाया। कई उपभोक्ता, जिनमें प्रवासी भी शामिल थे, एजेंट से सिलेंडर खरीदते थे, जो अब डीएसी की शर्तों के कारण सिलेंडर नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पूरे देश में 5 किलो का मुफ्त व्यापार सिलेंडर उपलब्ध कराया गया, जब तक इसका इस्तेमाल लगभग दोगुना नहीं हो गया। लोगों में भय पैदा करने वाले और खराब स्थिति बताने वाले झूठी अफवाहें फैलाने लगे और झूठे वीडियो शेयर करने लगे ताकि कमी, घबराहट और अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके, जबकि सरकार हर दिन युद्धकक्ष मोड में कई क्रांतिकारी कदम उठा रही थी, ताकि देश में किसी भी जगह आपूर्ति में बाधा न आये।
इस सब के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का दृढ़ संकल्प था - भारतीय नागरिक को सुरक्षा दी जायेगी चाहे खजाने पर कितना भी बोझ क्यों न पड़े —रूस-यूक्रेन संघर्ष और जीवन को संकट में डालने वाली कोविड चुनौती से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौरान यही ‘भारत की राह’ रही है। फरवरी और जून के बीच, रसोई गैस के अंतरराष्ट्रीय मानक, सऊदी सी पी, में लगभग 50% की वृद्धि हुई, और फिर भी, उस आयात दर पर ₹1,600 से अधिक की कीमत वाला सिलेन्डर उज्ज्वला घर तक ₹642 में पहुँचा। मोदी सरकार हर उज्ज्वला सिलेंडर पर लगभग ₹900 का और हर अन्य घर के लिए जाने वाले सिलेंडर पर करीब ₹600 का नुकसान उठाती है, आज सभी भारतीय परिवार अपने रसोई गैस के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन या फ्रांस के घरों की तुलना में बहुत कम भुगतान कर रहे हैं।
मार्च में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती का साहसिक निर्णय लिया गया, जिससे कीमत-वृद्धि में कमी आयी, जबकि कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी हो गयी थी और सरकारी तेल कंपनियों ने इस तिमाही में हर दिन 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाया। इसी अवधि में, अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 40% से अधिक और ब्रिटेन में करीब 20% बढ़ी, जबकि यूरोप के बड़े हिस्से में भी दहाई अंक की वृद्धि हुई, लेकिन भारत में कीमत में लगभग 7% की ही वृद्धि हुई।
एक और कहानी यह थी कि पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, विदेशी भंडार ख़त्म हो जाएंगे और हमारी आर्थिक संभावनाएँ धुंधली हो जाएंगी। भंडार खुद जवाब देते हैं, जो लगभग 690 बिलियन डॉलर के करीब है। यह संघर्ष शुरू होने के सप्ताह में रिकॉर्ड किये गये उच्चतम दर से केवल थोडा कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है।
यह कहा गया कि भारत के पास केवल 8 या 9 दिन का भंडार है और उसके पास ज्यादा भंडार रखने की वास्तविक क्षमता नहीं है, यह दावा 1.5 बिलियन लोगों वाली बड़ी ऊर्जा अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को गलत रूप में समझता है। आप किसी देश को कुछ गुफाओं से नहीं चला सकते, क्योंकि जमीन के भीतर रखी गई ऊर्जा से कुछ भी कमाई नहीं होती और उसे रखने में बहुत ज़्यादा खर्च भी आता है। इसके बजाय आप इसे इम्पोर्ट टर्मिनल, डिपो, पाइपलाइन, रिफाइनरी और पूरे देश में फैले स्टोरेज के सिस्टम के जरिए चलाते हैं, और आज भारत के पास 24 रिफाइनरी हैं, 47,000 किलोमीटर से ज्यादा तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, और 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं जो प्रतिदिन करीब 8 करोड़ लोगों की सेवा करते हैं।
उस प्रणाली की वास्तविकता की जांच, महाप्रलय का भय दिखाने वाले किसी भविष्यवक्ता की स्लाइड पर दिखाए गए आंकड़े से नहीं होती। असली जांच है - आधुनिक समय के सबसे बड़े ऊर्जा संकट के लगभग चार महीने गुजर जाने के बाद, क्या देश को अपने लोगों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी, क्या ईंधन सिर्फ सम-विषम नंबर प्लेट्स के हिसाब से देना पड़ा, क्या घर में ऑफिस बनाना पड़ा या क्या हर दिन 5 बजे अपने पंप बंद करने पड़े। भारत को इनमें से कोई काम नहीं करना पड़ा। यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पिछले कई सालों में इसकी तैयारी की गई थी। हमारे कच्चे तेल के बास्केट को 27 देशों से बढ़ाकर 41 करना, हमारे आयात टर्मिनल को दुगना करना, और प्रधानमंत्री मोदी के तहत एक दशक में बनाए गए पाइपलाइन और भंडार, होर्मुज के बंद होने पर ये सभी चीजें उपयोगी साबित हुईं; यही वजह थी कि रोशनी जलती रही।
इस स्तर का संकट एक देश को उसकी असली क्षमता दिखाता है। भारत ने होर्मुज के बंद होने की बाधा पार की और देश में कहीं भी बिना किसी कमी के आपूर्ति जारी रही। इस अनुभव से सीख लेकर, हम अपनी ऊर्जा सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त क्षमताओं का निर्माण करेंगे, लेकिन जब इस संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक पंक्ति मौजूद रहनी चाहिए: मानव स्मृति का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट हमारे तटों तक पहुंचा, लेकिन 150 करोड़ भारतीय नागरिक सुरक्षित रहे।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।) 

6/30/2026

सेशेल्स के राष्ट्रपति को भेंट की गई मुरादाबादी पीतल की कछुआ प्रतिमा


भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मुरादाबादी पीतल की कछुआ प्रतिमा सेशेल्स के राष्ट्रपति को भेंट की गई। यह विशेष उपहार उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की विश्वप्रसिद्ध पीतल शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे भारत की "ब्रास सिटी" के नाम से जाना जाता है।

कुशल शिल्पकारों द्वारा हस्तनिर्मित यह प्रतिमा मुरादाबाद की धातु ढलाई, नक्काशी और फिनिशिंग की उत्कृष्ट परंपरा को प्रदर्शित करती है। इसकी बारीक नक्काशी, आकर्षक चमक और कलात्मक डिजाइन पीढ़ियों से चली आ रही भारतीय शिल्पकला की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं।

भारतीय दर्शन में कछुआ ज्ञान, स्थिरता, धैर्य, दीर्घायु और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। यही गुण सेशेल्स की प्राकृतिक विरासत से भी गहराई से जुड़े हैं, जहां विश्व प्रसिद्ध एल्डाब्रा जायंट टॉर्टॉइज़ (Aldabra Giant Tortoise) प्राकृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। यह कछुआ दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे अधिक आयु तक जीवित रहने वाली कछुआ प्रजातियों में से एक है।

ऐसे में मुरादाबादी पीतल की कछुआ प्रतिमा केवल भारत की उत्कृष्ट हस्तशिल्प कला का परिचायक ही नहीं, बल्कि सेशेल्स के लिए विशेष सांस्कृतिक महत्व रखने वाला उपहार भी है। यह भारत और सेशेल्स के बीच प्रगाढ़ मित्रता, साझा मूल्यों तथा प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक है।

6/29/2026

आम लदी डीसीएम की चपेट में आने से बुजुर्ग की मौत, बेटा गंभीर


 परिजन व क्षेत्रीय लोगों ने लगाया 3 घंटो तक  जाम

शिवपुर थाना क्षेत्र के सुद्धिपुर बाईपास (हनुमान मंदिर के पास) पर सोमवार तड़के करीब 4 बजे एक भीषण सड़क हादसा हो गया। तेज रफ्तार आम लदी डीसीएम ने मिट्टी के कुल्हड़ बेचने जा रहे पिता-पुत्र को रौंद दिया। हादसे में हटिया (बसकडा) निवासी 65 वर्षीय छेदी लाल प्रजापति की मौके पर ही मौत हो गई। उनका 35 वर्षीय बेटा काशी गंभीर रूप से घायल है, जिसका अस्पताल में इलाज चल रहा है। ​हादसे का कारण चौराहे के पास एक मकान निर्माण के लिए मुख्य सड़क पर मिट्टी गिराई गई थी। तेज रफ्तार डीसीएम इसी मिट्टी पर चढ़कर अनियंत्रित हुई और पलट गई। यह घटना सीसीटीवी (CCTV) में भी कैद हुई है। मृतक के बड़े बेटे बनारसी की भी 3 महीने पहले ट्रेन हादसे में मौत हो गई थी। इस नए हादसे के बाद 10 लोगों के परिवार के सामने भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। घटना से आक्रोशित ग्रामीणों ने गिलट बाजार-बाबतपुर मार्ग पर चक्काजाम कर दिया। परिजनों ने ₹1 करोड़ मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की। मौके पर भारी पुलिस बल के साथ पहुंचे एसडीएम नितिन सिंह और एसीपी अपूर्व पांडेय ने परिजनों को उचित सरकारी मुआवजा और न्याय दिलाने का भरोसा दिया, जिसके बाद करीब 3 घंटे से लगा जाम सुबह 9:30 बजे समाप्त हुआ।

6/27/2026

विश्वकर्मा मार्शल आर्ट्स के पांच प्रतिभागियों को मिला ब्लैक बेल्टप्रशिक्षक रमाशंकर विश्वकर्मा को भी किया गया सम्मानित

वाराणसी। विश्वकर्मा मार्शल आर्ट्स (दानियालपुर, सोनातलाब) के तत्वावधान में रविवार 28 जून 2026 को कॉम्बैट कराटे प्रतियोगिता के तहत पांच सीनियर प्रतिभागियों को ब्लैक बेल्ट प्रदान किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. सुनील कुमार विश्वकर्मा (विभागाध्यक्ष, ललित कला विभाग), डॉ. मेजर अरविंद कुमार सिंह, कारगिल योद्धा अजय कुमार सिंह एवं स्थानीय पार्षद जितेंद्र कुशवाहा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
संस्था के निदेशक रमाशंकर विश्वकर्मा ने संस्था की गतिविधियों और उद्देश्य के बारे में जानकारी दी। वहीं उपाध्यक्ष गोविंद विश्वकर्मा ने बच्चों के कठिन परिश्रम और प्रशिक्षण के दौरान किए गए प्रयासों से सभी को अवगत कराया।
इस अवसर पर सीनियर खिलाड़ियों ने मार्शल आर्ट की विभिन्न विधाओं का प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा दिखाई। संस्था के खिलाड़ियों पलक विश्वकर्मा, साधना गुप्ता, खुशी राजभर, करन भारद्वाज और रेहान अंसारी को अतिथियों द्वारा ब्लैक बेल्ट एवं प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।
कार्यक्रम में स्थानीय पार्षद जितेंद्र कुमार कुशवाहा ने बच्चों और संस्था को बधाई देते हुए हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया। कारगिल योद्धा अजय कुमार सिंह ने बच्चों को कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत बनाए रखने और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया। डॉ. मेजर अरविंद कुमार सिंह ने समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मुख्य अतिथि प्रो. सुनील कुमार विश्वकर्मा ने कहा कि बच्चे देश का भविष्य हैं और उनकी मेहनत का परिणाम ब्लैक बेल्ट के रूप में सामने है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का अंगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन विवेक विश्वकर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन गोविंद विश्वकर्मा ने दिया। इस दौरान संस्था के सभी सीनियर-जूनियर खिलाड़ी, अभिभावक एवं अन्य लोग मौजूद रहे।

काशी से अमरनाथ यात्रा के लिए रवाना हुआ पहला जत्था, सेवादारों ने संभाली सेवा की कमान

वाराणसी। बाबा बर्फानी के पवित्र दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही धर्मनगरी काशी से श्रद्धालुओं का पहला जत्था रविवार को रवाना हो गया। श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति के तत्वावधान में सेवादारों और श्रद्धालुओं का पहला दल वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से हावड़ा-अमृतसर मेल के माध्यम से कश्मीर के लिए प्रस्थान किया।

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी काशी से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए रवाना हो रहे हैं। समिति के अनुसार, काशी से हजारों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा में शामिल होते हैं। श्रद्धालु पहले अमृतसर पहुंचेंगे, जहां से जम्मू होते हुए पहलगाम तक का सफर तय करेंगे। इसके बाद पवित्र गुफा तक की यात्रा पैदल पूरी की जाएगी।

श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति पिछले 26 वर्षों से अमरनाथ यात्रियों की सेवा में जुटी हुई है। समिति की ओर से यात्रा के दौरान लगभग 300 श्रद्धालुओं के रहने, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है। इस वर्ष भी समिति द्वारा बड़ी संख्या में यात्रियों को दर्शन कराने में सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

समिति के सेवादार दिलीप सिंह ‘बंटी’ ने बताया कि 80 से 90 सेवादारों का दल यात्रा पर जा रहा है। इनमें 10 सेवादारों का समूह उनके, विवेक श्रीवास्तव और कुलदीप त्यागी के नेतृत्व में पंजाब जाएगा, जबकि लगभग 70 सेवादार बेगमपुरा एक्सप्रेस से सीधे जम्मू होते हुए चंदनबाड़ी पहुंचेंगे और वहां से सेवा कार्यों में जुटेंगे।

उन्होंने बताया कि अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को हर संभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए समिति पूरी तरह तैयार है। यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के लिए भोजन, आवास और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

समिति के इस सेवा अभियान को जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का भी सहयोग मिल रहा है। आयोजन में महापौर अशोक तिवारी, विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी, विधायक सौरभ श्रीवास्तव, मंत्री दयाशंकर मिश्रा ‘दयालु’, शांति लाल जैन सहित कई गणमान्य लोगों का सहयोग प्राप्त हो रहा है। वहीं श्रद्धालुओं के लिए पान और मिठाई की व्यवस्था छक्कन दादा, राजेश चौरसिया और नंदनी परिवार की ओर से की जाएगी।