2/19/2026

बाबा

भगवान शिव के 19 अवतार शिव महापुराण में भगवान शिव के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है, लेकिन बहुत ही कम लोग इन अवतारों के बारे में जानते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव के 19 अवतार हुए थे। आइए जानें शिव के 19 अवतारों के बारे में।1- वीरभद्र अवतारभगवान शिव का यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वाराआयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्यागकिया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तोउन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसेरोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया।2- पिप्पलाद अवतारमानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं सेपूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्वही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह कीदृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकरबड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने काश्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।3- नंदी अवतारभगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं।भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात काअनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद नेअयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिवकी तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।4. भैरव अवतारशिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूपबताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया सेप्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ माननेलगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवा सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।5- अश्वत्थामा महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्रअश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतारथे। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने कीलिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदानदिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मेें अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।6- शरभावतार भगवान शंकर का छटा अवतार है शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (पुराणों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था।लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसकेअनुसार-हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकशिपु के वध के पश्चातभी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवताशिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव ने शरभावतारलिया और वे इसी रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांतनहीं हुई। यह देखकर शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब कहीं जाकर भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमायाचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।7- गृहपति अवतार भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथाइस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तकनि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करनेके लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोरतप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाईदिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकीपूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ सेअवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मतिगर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं, पितामह ब्रह्मा ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।8- ऋषि दुर्वासा भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा काअवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नीसहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिताका यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया।9- हनुमान भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठमाना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं औरदानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप कोदेखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपनावीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।10- वृषभ अवतार भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतारलिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों कासंहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णुदैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सीचंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए। विष्णु के इन पुत्रों ने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।11- यतिनाथ अवतार भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया था। उन्होंने इस अवतार में अतिथिबनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी, जिसके कारणभील दम्पत्ति को अपने प्राण गवाने पड़े। धर्म ग्रंथों केअनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:कालआहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक कामार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।12- कृष्णदर्शन अवतारभगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्योंके महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्मका प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीयश्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ।विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए नभग जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गए। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके, उनके धन को प्राप्त करे। तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारणद्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्ण दर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा- वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।13- अवधूत अवतार भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा। इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा, वैसे ही उनका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।14- भिक्षुवर्य अवतार भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हरप्राणी के जीवन के रक्षक भी हैं। भगवान शंकर काभिक्षुवर्यअवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भनरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवतीपत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन कोबालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण कानिर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भनरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूपदिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उस बालकका पालन-पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक नेशिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपनाराज्य प्राप्त किया।15- सुरेश्वर अवतार भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ।उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकरशिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथाक्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया।उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति कापद भी दिया।16- किरात अवतार किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन कीवीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसारकौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया वपाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरानजब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा।अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया, उसी समयभगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव कीमाया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाए और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगे। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।17- सुनटनर्तक अवतार पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथमागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था।हाथ में डमरू लेकर शिवजी नट के रूप में हिमाचल के घर पहुंचे और नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तोनटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इसपर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराजवेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयंचले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञानहुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चयकिया।18- ब्रह्मचारी अवतार दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालयके घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिएघोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिएशिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे।पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा औरजानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासीव कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोधहुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हेंअपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अतिप्रसन्न हुईं।19- यक्ष अवतार यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्याअभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्मग्रंथों के अनुसार देवता व असुर द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कण्ठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए साथ ही उनहें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं। देवताओं के इसी अभिमान को तोडऩे के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।मेरा आप सभी मित्रो से निवेदन है की आप इस मेसेज को अधिक।से अधिक आगे भेजकर अपने हिन्दू भाइयो को अपने संस्कृति का ज्ञान प्रदान करे।

1/19/2026

बंसत पंचमी पर किया जाएगा बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव।

होगी काशी के लोकउत्सव 
"तिलकोत्सव से रंगोत्सव तक" की शुरुआत 

वाराणसी- बंसत पंचमी के अवसर पर हर वर्ष की तरह टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की पंचबदन प्रतिमा का परंपरानुसार तिलकोत्सव किया जाएगा।

परंपरानुसार महाशिवरात्रि के पुर्व बंसत पंचमी पर (शुक्रवार को) काशीवासियों द्वारा टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर तिलकोत्सव किया जाएगा। इसी के साथ बाबा विश्वनाथ के सगुन से जुड़ी लोकपरंपरा की शुरुआत हो जाएगी जो रंगभरी-एकादशी पर गौरा के गौना तक चलेगी।

शुक्रवार को बंसत पंचमी पर तिलकोत्सव के बाद महाशिवरात्री के दो दिन पूर्व बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा को काशीवासियों द्वारा सगुन की हल्दी लगाई जायेगी।

बाबा विश्वनाथ से जुड़ी लोकपरंपराओं से आयोजन से संबंधित शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया शुक्रवार को बंसत पंचमी के अवसर पर सायंकाल तिलकोत्सव से पुर्व टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर परिवार की वरिष्ठ श्रीमती मोहिनीदेवी के सानिध्य में अंकशास्त्री महंत वाचस्पती तिवारी बाबा की पंचबदन प्रतिमा का 11 वैदिक ब्रहमणों के साथ विशेष पुजन करने बाद विशेष श्रृंगार किया जाएगा। सायंकाल लग्नानुसार विश्वनाथ मंदिर में होने वाली सप्तर्षि आरती के पुर्व बाबा की प्रतिमा का परंपरानुसार काशीवासी वैदिक विधि-विधानपूर्वक तिलकोत्सव करेंगे।

कौड़िया शाह बाबा का सालाना उर्स अकीदत

वाराणसी के चौका घाट हुकुलगंज रोड किनारे हर साल की तरह इस वर्ष भी कौड़िया शाह बाबा का सालाना उर्स अकीदत और धूमधाम से मनाया गया। उर्स के मौके पर बाबा के चाहने वालों ने बड़ी संख्या में शिरकत की। कार्यक्रम के दौरान लंगर का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
उर्स समारोह की अध्यक्षता निज़ामुद्दीन कुरैशी ने की, जबकि महामंत्री शाहिद कुरैशी मौजूद रहे। परंपरा के अनुसार बाबा की शान में कव्वाली पेश की गई, जिसे सुनकर माहौल पूरी तरह सूफियाना रंग में रंग गया।
इस अवसर पर सदस्य मुख्तार बाबा, आरिफ कुरैशी, आसिफ कुरैशी, सलामुद्दीन कुरैशी, गोलू माली, शुभम माली, सुन्दरम माली, कल्लू भाई सहित भारी संख्या में क्षेत्रीय लोग और अकीदतमंद उपस्थित रहे। सभी ने बाबा की दरगाह पर चादरपोशी कर अमन, चैन और भाईचारे की दुआ मांगी।

1/14/2026

डॉ. शुभम कुमार सेठ ने रखी समाज की सशक्त आवाज**स्वर्णकार समाज की समस्याओं पर हुआ गंभीर विचार-विमर्श

वाराणसी/नई दिल्ली। स्वर्णकार समाज के हितों से जुड़े विविध महत्वपूर्ण विषयों को लेकर एबीवीपी नेता व छात्रसंघ के पूर्व महामंत्री अधिवक्ता डॉ. शुभम कुमार सेठ ने दिल्ली आवास पर संसद सदस्य - राज्यसभा श्री रामचंद्र जांगड़ा जी से शिष्टाचार भेंट के दौरान विस्तृत, गंभीर एवं सार्थक चर्चा किया और साथ ही समाज की वर्तमान परिस्थितियों, प्रमुख समस्याओं तथा भविष्य की संभावनाओं पर गहन संवाद किया। भेंट के दौरान स्वर्णकार समाज की पारंपरिक कला एवं सांस्कृतिक विरासत, कारीगरों की आजीविका, व्यापार में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयाँ, बढ़ती लागत, सरकारी नीतियों का प्रभाव, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा तथा युवाओं के रोजगार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। समाज के समग्र उत्थान हेतु सरकारी योजनाओं की प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करने, कारीगरों को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग एवं सामाजिक सम्मान प्रदान करने जैसे बिंदुओं को प्रमुखता से रखा गया।
चर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि स्वर्णकार समाज की पारंपरिक पहचान को संरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप सशक्त किया जाए। समाज के युवाओं को शिक्षा, स्वरोजगार एवं उद्यमिता से जोड़ने पर जोर दिया गया, जिससे आने वाली पीढ़ी आत्मनिर्भर बन सके और समाज का सतत विकास सुनिश्चित हो। माननीय राज्यसभा सांसद श्री रामचंद्र जांगड़ा जी ने सभी विषयों को गंभीरता से सुना तथा स्वर्णकार समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील एवं सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि समाज से जुड़े मुद्दों को संसद एवं संबंधित मंचों पर प्रभावी ढंग से उठाया जाएगा तथा समाधान की दिशा में हर संभव सहयोग प्रदान किया जाएगा।
इस अवसर अधिवक्ता डॉ. शुभम कुमार सेठ ने समाज की भावनाओं, अपेक्षाओं एवं जमीनी समस्याओं को संतुलित एवं स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया, जिससे चर्चा और अधिक उद्देश्यपूर्ण एवं सार्थक बनी। यह शिष्टाचार भेंट स्वर्णकार समाज के लिए प्रेरणादायी एवं आशाजनक रही, जिसने समाज में विश्वास, जागरूकता और सकारात्मक सोच का संचार किया।

1/11/2026

केंद्रीय रेल राज्यमंत्री को बाबा विश्वनाथ का स्मृति चिन्ह भेंट

डॉ. शुभम कुमार सेठ ने दिल्ली रेल भवन में की मुलाक़ात*

नई दिल्ली।
दिल्ली स्थित रेल भवन में आज एक महत्वपूर्ण सौजन्य भेंट के दौरान भारत सरकार के माननीय केंद्रीय जल एवं रेल राज्यमंत्री श्री वी. सोमन्ना जी से वाराणसी छात्रसंघ के पूर्व महामंत्री एवं अधिवक्ता डॉ. शुभम कुमार सेठ ने मुलाकात कर उनका आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्राप्त किया। डॉ. सेठ ने वाराणसी की महान आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक बाबा श्री काशी विश्वनाथ जी का पवित्र अंगवस्त्र और सुंदर स्मृति-चिह्न मंत्री महोदय को भेंट कर उनके जनहितकारी कार्यों और नेतृत्व के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त की।
मुलाकात के दौरान माननीय मंत्री श्री वी. सोमन्ना जी ने भारतीय रेल में चल रहे विभिन्न विकास कार्यों, आधुनिक सुविधाओं के विस्तार, सुरक्षा उपायों की मजबूती तथा आने वाली बड़ी परियोजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय रेल को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक सुधार और तकनीकी आधुनिकीकरण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
डॉ. शुभम कुमार सेठ ने वाराणसी सहित पूर्वांचल क्षेत्र की रेल आवश्यकताओं, यात्रियों की समस्याओं, कनेक्टिविटी, स्टेशन उन्नयन और नई सेवाओं से जुड़े जनसरोकारों को मंत्री महोदय के समक्ष रखा। मंत्री श्री सोमन्ना जी ने सभी मुद्दों को गंभीरता से सुनते हुए आवश्यक कदम उठाने और सकारात्मक सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य रेलवे को अधिक सुविधाजनक, सुरक्षित और जनता-केंद्रित बनाना है।
इस सौहार्दपूर्ण बैठक में सामाजिक एवं जनहित से जुड़े अन्य विषयों पर भी सारगर्भित चर्चा हुई। माननीय मंत्री द्वारा प्रदर्शित आत्मीयता, सरलता और पारिवारिक स्नेह ने मुलाकात को अत्यंत प्रेरणादायी बना दिया।
डॉ. शुभम कुमार सेठ ने आशा व्यक्त की कि मंत्री श्री वी. सोमन्ना जी के नेतृत्व में भारतीय रेल राष्ट्रीय विकास में नई गति, नई ऊर्जा और आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती रहेगी।