5/19/2026

तपता बनारस जलता इंसान काशी में 45 डिग्री में बनारस में 50 डिग्री वाला गर्मी का टार्चर

वाराणसी: काशी नगरी इन दिनों सूर्य की प्रचंड किरणों से तप रही है। मौसम विभाग के अनुसार तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है, लेकिन बनारसवासियों को लग रहा है जैसे पारा 50 डिग्री को पार कर गया हो। सड़कें तवे की तरह जल रही हैं, हवा में लू का थपेड़ा ऐसा कि सांस लेना मुश्किल हो गया है। दिन ढलने के बाद भी राहत नहीं मिल रही। रातें भी उमस भरी और बेचैन कर देने वाली हो गई हैं।शहर की हरियाली का विनाश ही इस भीषण गर्मी का सबसे बड़ा कारण बन गया है। पुराने बनारस में जहां एक समय घने पेड़ों की छांव गलियों को ठंडक प्रदान करती थी, आज वही गलियां कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुकी हैं। 

पर्यावरणविदों का कहना है कि पिछले दो दशकों में शहर से हजारों पेड़ काट दिए गए। सड़क चौड़ीकरण, मॉल, अपार्टमेंट और व्यावसायिक निर्माणों ने हरे-भरे इलाकों को निगल लिया। अब शहर में बचे पेड़ों को गिनने के लिए उंगलियां काफी हैं।“पहले घाटों पर हवा भी ठंडी आती थी। अब तो गंगा किनारे भी धूप से बचने की जगह नहीं मिल रही,”
 
सुबह-शाम घाटों पर ठंडक की उम्मीद में लोग पहुंचते हैं, लेकिन लौटते हुए और भी थके हुए नजर आते हैं।शहर के विभिन्न इलाकों में स्थिति और बदतर है। लंका, रविन्द्रपुरी, कैंट, गोदौलिया,  चौक और लगभग सभी घनी आबादी वाले क्षेत्रों में कंक्रीट की दीवारें और काली सड़कें दिन भर सूर्य की गर्मी सोखती हैं और रात में उसे छोड़ती हैं। नतीजतन रात का तापमान भी सामान्य से 4-5 डिग्री ज्यादा रह रहा है। 

डॉक्टरों के अनुसार हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और त्वचा संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है। बनारस की पारंपरिक वास्तुकला भी इस संकट को बढ़ा रही है। संकरी गलियां, ऊंची-ऊंची इमारतें और हवा के रास्ते बंद होना गर्म हवा को फंसाए रखता है। जहां पहले बांस और खपरैल की छतें प्राकृतिक कूलिंग का काम करती थीं, वहीं आज सीमेंट-कंक्रीट की छतें भट्ठी का रूप ले चुकी हैं।

पिछले कुछ दशकों में शहर का शहरीकरण बिना किसी मास्टर प्लान के हो रहा है। ग्रीन कवर घटने से अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) प्रभाव पैदा हो गया है। 

प्रशासन की ओर से पेड़ लगाने के दावे किए जाते रहते हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है। लगाए गए अधिकांश पौधे सूख जाते हैं क्योंकि उनकी देखभाल नहीं होती। 

गर्मी ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।  सब्जी-फल विक्रेता दोपहर में दुकानें बंद कर देते हैं। स्कूलों में छुट्टियां बढ़ा दी गई हैं। बिजली की मांग बढ़ने से ट्रांसफार्मर जलने की घटनाएं आम हो गई हैं।बनारस की यह पीड़ा सिर्फ एक शहर की नहीं है। यह पूरे उत्तर भारत के शहरीकरण मॉडल की विफलता की कहानी है। जहां विकास के नाम पर हरियाली को कुचल दिया जा रहा है। 

अगर यही स्थिति रही तो आने वाले सालों में 45 डिग्री 55 डिग्री जैसा महसूस होने लगेगा।समय अब भी है। अगर प्रशासन, नागरिक समाज और पर्यावरण प्रेमी मिलकर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने, पुराने पेड़ों को बचाने और शहरी नियोजन में हरित तत्व शामिल करने का संकल्प लें, तो बनारस फिर से ठंडी हवाओं और छांव वाली नगरी बन सकता है। वरना यह कंक्रीट का जंगल न सिर्फ बनारसवासियों को, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी जलाता रहेगा।

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