6/11/2026

BHU आयुर्वेद संकाय के पदोन्नति नियम पर राष्ट्रीय आयोग की आपत्ति

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति के लिए बनाए गए डीएसीपी (डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन) नियम को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय चिकित्सा पद्धति राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएसएम) ने आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के निर्धारित मानकों के विपरीत बनाए गए इस नियम पर आपत्ति जताते हुए इसे तत्काल प्रभाव से निरस्त करने के निर्देश दिए हैं।
जानकारी के अनुसार आयोग के रेटिंग बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. मुकुल पटेल को इस संबंध में शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति के लिए आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक अनुभव की अनदेखी की जा रही है। शिकायत की समीक्षा के बाद आयोग ने विश्वविद्यालय प्रशासन को नियमों के अनुरूप कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि रेगुलेशन-17 के तहत आयुर्वेद शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर पद के लिए न्यूनतम 10 वर्ष का नियमित शिक्षण अनुभव अनिवार्य है। इसके अंतर्गत 10 वर्ष सहायक प्राध्यापक अथवा 5 वर्ष सहायक प्राध्यापक और 5 वर्ष एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में अनुभव होना चाहिए। आयोग का कहना है कि इससे कम अनुभव रखने वाले शिक्षकों को प्रोफेसर के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।
आरोप है कि बीएचयू आयुर्वेद संकाय में लागू की जा रही डीएसीपी योजना में मात्र 9 वर्ष के अनुभव पर पदोन्नति का प्रावधान किया गया था, जो आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयोग के नियमों के विपरीत है। इस व्यवस्था को लेकर संकाय के कई शिक्षकों ने पहले भी विरोध दर्ज कराया था।
सूत्रों का कहना है कि इस नियम को लेकर लंबे समय से असंतोष का माहौल था और कुछ लोगों ने इसे विशेष व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश बताया। हालांकि इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शिक्षा और आयुर्वेद क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि आयोग के निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो भविष्य में आयुर्वेद संकाय की मान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। आयोग की सख्ती के बाद अब विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

No comments:

Post a Comment