जब दुनिया ज़ुल्म और नाइंसाफी के अंधेरों में डूब रही थी, तब कर्बला की सरज़मीं पर हक़ का एक ऐसा चराग़ रौशन था, जिनका नाम था इमाम हुसैन (अ.स.)।
कर्बला सिर्फ एक जंग नहीं थी, बल्कि हक़ और बातिल, इंसाफ और ज़ुल्म, सब्र और सरकशी के बीच का फैसला थी। यह वह मैदान था जहाँ तलवारों से ज़्यादा ईमान की ताकत दिखाई दी और जहाँ कुर्बानी ने इंसानियत को जीने का रास्ता सिखा दिया
10 मुहर्रम का दिन था। तपती रेत, प्यासे बच्चे, भूखे साथी और चारों तरफ याजीदी लाखो का लश्कर था। हर तरफ दुश्मन के साए मंडरा रहे थे, लेकिन एक चीज़ ऐसी थी जिसे किसी ने नहीं छोड़ा—वह थी नमाज़।
इमाम हुसैन (अ.स.) जानते थे कि शहादत का वक्त करीब है। उन्हें मालूम था कि उनके साथी, उनके भाई, उनके बेटे और उनके अहले-बैत सब अल्लाह की राह में शहीद कर दिए जायेंगे अगर इमाम हुसैन (अ.स.) चाहता तो एक इसारे पर हालात बदल जाते, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) ने दुनिया को सब्र, इबादत और रज़ा-ए-इलाही का सबक सिखाने के लिए हर तकलीफ को गले लगाया।
इमाम हुसैन (अ.स.) की तरफ से जंग करने जफ़र जिन तक वहां पर आ गाये थे जो सिर्फ मौला हुसैन से इज़्ज़त मांग रहे थे मगर प्यारे हुसैन ने इज़्ज़त ना दी और वापस भेज दिया जफ़र जिन रो रो कर बार बार बोल रहे थे मगर मौला ने मना कर दिया
मौला गाज़ी अब्बास ने भी कहा मौला मुझे इज़्ज़त दीजिये मगर प्यारे इमाम हुसैन (अ.स.) ने इज़्ज़त नही दी
जब नमाज़ का वक्त हुआ, तो तीरों और तलवारों के बीच भी आपने फरमाया, "नमाज़ का वक्त हो गया है।"
सोचिए, जहाँ लोग छोटी-छोटी परेशानियों में नमाज़ छोड़ देते हैं, वहाँ कर्बला में याजीदी लस्कर थी , फिर भी नमाज़ कायम की गई। उनके वफादार साथियों ने कहा, "मौला! आप नमाज़ पढ़िए, हम आपकी हिफाज़त करेंगे।"
कुछ साथी ढाल बनकर खड़े हो गए। तीर उनके जिस्मों को चीरते रहे, खून बहता रहा, लेकिन सजदा जारी रहा। क्योंकि कर्बला यह पैगाम देती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अल्लाह से रिश्ता कभी नहीं टूटना चाहिए।
एक-एक करके साथी शहीद होते गए। भाई शहीद हुए, भतीजे शहीद हुए, बेटे शहीद हुए और छह महीने के मासूम अली असगर (अ.स.) भी शहीद कर दिए गए। मगर इमाम हुसैन (अ.स.) के सब्र में कोई कमी नहीं आई। उनके लबों पर सिर्फ यह था:
*"ऐ अल्लाह! मैं तेरी रज़ा पर राज़ी हूँ।"*
आखिर वह घड़ी भी आ गई जब इमाम हुसैन (अ.स.) अकेले रह गए। चारों तरफ दुश्मन था, लेकिन उनके दिल में सिर्फ अल्लाह की मोहब्बत और ज़ुबान पर उसका ज़िक्र था। उन्होंने आखिरी सजदा किया और अपने आपको अल्लाह की राह में शहीद कर दिया।
कर्बला हमें सिखाती है कि मुश्किलें ज़रूर आएंगी, लेकिन ईमान नहीं टूटना चाहिए। नमाज़ को हर हाल में कायम रखना चाहिए, सच का साथ देना चाहिए, मजलूम का सहारा बनना चाहिए और ज़ुल्म के सामने कभी सिर नहीं झुकाना चाहिए।
अगर हम इमाम हुसैन (अ.स.) से मोहब्बत करते हैं, तो हमें उनकी सीरत पर भी चलना होगा। नमाज़ को अपनाना होगा, सब्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना होगा और इंसाफ के लिए खड़ा होना होगा।
कर्बला का पैगाम किसी एक कौम या मजहब के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है।
सलाम हो इमाम हुसैन (अ.स.) पर।
सलाम हो कर्बला के शहीदों पर।
सलाम हो उस सजदे पर जिसने इंसानियत को जीना सिखा दिया।
हर दिल की यही सदा है,
हर ज़ुबान की यही पुकार है,
नमाज़, सब्र और कुर्बानी का नाम ही हुसैन है,
और हुसैन इंसानियत का सबसे बुलंद किरदार है।
❤️ या हुसैन (अ.स.)
🖤 **लब्बैक या हुसैन (अ.स.)
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