वाराणसी। भारतीय सर्राफा व्यापार केवल आभूषणों का क्रय-विक्रय नहीं, बल्कि सदियों पुराने विश्वास, पारिवारिक आत्मीयता, स्त्री-धन की सुरक्षा और अनूठी हस्तकला की जीवंत विरासत रहा है। गांव-कस्बों के पारंपरिक सुनार तराजू की शुद्धता और जुबान की साख पर पीढ़ियों से समाज के सुख-दुख के साथी रहे हैं। परंतु वर्तमान समय में यह पारंपरिक ताना-बाना कॉरपोरेट घरानों की आक्रामक नीतियों, 'सस्ते मेकिंग चार्ज' की अंधी दौड़ और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अपने सबसे गंभीर अस्तित्व संकट से जूझ रहा है। अखिल भारतीय स्वर्णकार समाज विकास एवं शोध संस्थान नई दिल्ली ,उत्तर प्रदेश राज्य के प्रदेश विधिक सलाहकार श्री सुरेन्द्र सेठ एडवोकेट ने स्वर्णकारी व्यवसाय से जुड़े कारीगरों और छोटे दुकानदारों की समस्या को प्रमुखता से रखते हुए यह बातें कही। उन्होंने सर्राफा कारीगरों और ज्वैलरी व्यवसाय से जुड़े छोटे कारीगरों की समस्याओं को गंभीरता से लेने की बात कही और बताया कि 3% या 'मुफ्त मेकिंग चार्ज' जैसी योजनाएं आम उपभोक्ता को आकर्षित करती हैं, लेकिन यह वास्तव में स्थानीय बाजार को समाप्त कर एकाधिकार स्थापित करने की सुनियोजित आर्थिक रणनीति है। छोटे प्रतिस्पर्धियों या छोटे ज्वैलर्स के खत्म होते ही यही ब्याज दर और मेकिंग चार्ज दरें मनमाने ढंग से बढ़ाई जाएंगी।जिन बड़े थोक घरानों ने दशकों तक छोटे रिटेलर्स के भरोसे अपनी पूंजी बनाई, आज वे खुदरा बाजार के सीधे मुनाफे के लालच में उतर आए हैं। वे अपने ही खरीदार छोटे दुकानदारों के समानांतर खुदरा शोरूम खोलकर और मशीनरी के दम पर मेकिंग चार्ज गिराकर पारंपरिक रिटेलर्स को बाजार से बाहर कर रहे हैं।शादियों और त्योहारों पर महानगरों की कंपनियां जिलों के होटलों में दो-तीन दिन की प्रदर्शनियां लगाकर स्थानीय पूंजी समेट ले जाती हैं। इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था और कारीगरों को शून्य लाभ होता है और किसी विवाद की स्थिति में उपभोक्ता के पास कोई स्थानीय जवाबदेही नहीं बचती।गांव-कस्बे का हुनरमंद सुनार जीएसटी और ई-वे बिल की जटिल कागजी औपचारिकताओं में उलझ गया है। वहीं, चोरी के मामलों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 317 जो पुरानी IPC 411 के तहत बिना ठोस जांच के छोटे स्वर्णकारों को निशाना बनाया जाता है, जबकि बड़े शोरूम इस दबाव से मुक्त रहते हैं।मशीनी होड़ और नाममात्र के गढ़ाई शुल्क ने कुंदन, जड़ऊ और मीनाकारी जैसी विधाओं के सिद्धहस्त शिल्पी वर्ग को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया है। कई हुनरमंद कारीगर मजदूरी करने पर विवश हैं।जो थोक व्यापारी खुदरा बाजार में उतरकर छोटे रिटेलर्स का हक मार रहे हैं, उनसे माल खरीदना पूरी तरह बंद किया जाए—वे या तो होलसेल करें या रिटेल।ब्लॉक और जनपद स्तर पर 'सर्राफा रक्षा समितियां' गठित हों, ताकि धारा 317 व पुलिसिया मनमानी के विरुद्ध एकजुट होकर विधिक व सामाजिक लड़ाई लड़ी जा सके।ग्राहकों को जागरूक किया जाए कि संकट के समय केवल स्थानीय सुनार ही काम आता है, कोई कॉरपोरेट मॉल या अस्थायी प्रदर्शनी नहीं।स्थानीय कारीगरों को सम्मानजनक मेहनताना देकर 'हैंडमेड' गहनों को प्रीमियम कला के रूप में स्थापित किया जाए। अंत में उन्होंने समस्त संगठनों को आवाहन करते हुए कहा की अब समय आ गया है जब सभी सर्राफा एसोसिएशन और संगठनों को एक साथ आकर एक मंच पर एक राय होकर लड़ाई लड़नी होगी यह लड़ाई केवल दुकानदारी बचाने की नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर, ग्रामीण स्वावलंबन और कारीगरों के चूल्हे को जलते रखने की अंतिम पुकार है। संगठित होकर ही इस अस्तित्व संकट पर विजय संभव है।
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